गंगा जमुनी तरजीह की हमारी एक गायकी आल्हा डा.बाबूलाल दाहिया
भुजरियों पर विशेष
गंगा जमुनी तरजीह की हमारी एक गायकी आल्हा  डा.बाबूलाल दाहिया

 इटारसी प्राचीन समय में गाँव गाँव में आल्हा गायकी का बड़ा प्रभाव था जिसे ढोलक के साथ गाया जाता था।पर अग्रेजो ने जब अठारहमी शताब्दी में इसका बामन लड़ाइयों का एक ग्रन्थ ही प्रकाशित करा दिया तो यह लोगो द्वारा बाच कर सुनाया जाने लगा ।
आल्हा मुख्य तह बरसात में सुनाया जाने वाला गीत काब्य है जिसके रचयिता टीकमगढ़ निवासी जगनिक नामक एक भाट कवि माने जाते है। यह आल्हा ऊदल नामक दो बहादुरों के युद्ध का काब्य है जो महोबा के रहने वाले बनाफर राजपूत और राजा परिमर्द देव् के सामन्त थे।
यू तो आल्हा गायकी एक राशो गीत है जिसमे आल्हा ऊदल के बहादुरी का बखान है पर बुन्देली बोली में रचित इस राशो ग्रन्थ की अनेक विशेषता है। यही करण था कि पृथीराज राशो ,भीसलदेव राशो ,खुमानदेव राशो आदि तमाम राशो ग्रन्थ तो लाइ ब्रेरियो की शोभा ही बढ़ाते रहे , पर आल्हा राशो अनेक बोलियों में अनूदित हो लगभग600 वर्षों तक लोक कंठ से मुखर होता रहा।
इस के लोक प्रियता का कुछ कारण इस प्रकार है।

1,, अन्य राशो ग्रन्थ के रचयिता जहां अपने पात्रो को श्रेष्ठ कुल के राजपूत सूर्य वंशी चन्द्र वंशी आदि बताते है वही आल्हा राशो का रचइता अपने पात्रो को बार बार ,,ओछी जात बनाफर राय,, कहता है । उनके साथी भी कोई राजपूत नही , बल्कि साधारण लोग ही ,धनुहा तेली, लला तमोली, मन्ना गुजर खुन खुन कोरी और मदन गड़रिया आदि है पर बहादुर इतने कि बड़े बड़े तलवार बाजो के दांत खट्टे कर दे। इस लिए उसमे जन सामान्य अपने को सामिल सा पाता है। 2,, साथियो की बहादुरी ।जब जाति ओछी हो तो भला कौन राजपूत अपनी लड़की के बिवाह के लिए मण्डप छवाये गा पर बनाफ्ररो का तो अपना वसूल था कि, जिसकी लड़की सुंदर देखी जोरा जोरी करे बिवाह । तो बनाफर लोग भाला बरछी साग और ढाल तलवारों से ही मण्डप को छा देते है। उधर उनके नाई बारी और बिवाह कराने वाले पंडित भी इतने जाबाज है कि एक ओर तो वे विवाह की रस्म भी पूरी करते जाते तो दूसरी ओर बनाफर के जोरा जोरी बिवाह से तम तमाया कोई राज पूत यदि वर को मारने के लिए तलवार निकालता है तो वह नाई बारी और पंडित ढाल अड़ा कर उसका वार भी बिफल करते रहते है।
एक सब से बड़ी विशेषता इस में यह है कि आल्हा गायकी प्रभाव वाले क्षेत्र में साम्प्रदायिक दंगे कभी नही हुए। इस का कारण यह रहा कि आल्हा ऊदल के अविभावक ताल्हन सैयद नामक एक मुसलमान सरदार है। जिनके लिए आल्हा कहते है कि,
चाचा चाचा कह गोहरायो, चाचा मेरे तलन्सी राय। जब से मर गए बाप हमारे, गोद तुम्हारी गये बैठाय।। किन्तु न सिर्फ ताल्हन सैयद बल्कि उनके 22 बेटे भी आल्हा ऊदल की रक्षा के लिए हमेशा अपनी जान तक देने के लिए ततपर रहते है। आल्हा ऊदल मल्खान के विवाह की भी रचना काऱ ने बड़ी रोचक कथा गढ़ी है कि, उनकी सुंदरता और बहादुरी देख राज पूत कन्याये खुद कहने लगती है कि,
यातो ब्याह होय आल्हा सग, या जीवन भर रहूं कुँवारि। और खुद ही तोते के गले में बाध कर पत्र भिजवाती थी जिसमे यह भी लिखती थी कि, अगर तुम ने बिवाह न किया तो कटार भोक कर प्राण देदूगी । फलस्वरूप आल्हा ऊदल मलखांन को साधू का भेष रख कर महलों में भीख मांगने के बहाने जाना पड़ता था । पर बाकी सब तो चेले रहते थे , महंत की भूमिका में वहां ताल्हन सैयद ही होते थे । और वही उन राजपूत कन्याओं को आस्वासन देते है कि बेटी मै गंगा की सौगंध खा कर कहता हूं कि तेरा दो माह में बिवाह करा दूगा। यू तो आल्हा राशो में तमाम अतिश्योक्ति पूर्ण बाते और अंध विश्वास भी है। पर हमारी गंगा जमुनी संस्क्रति और साझी बिरासत को कायम रखने में इसका बहुत बड़ा योग दान रहा है।40 ,,50 के दसक में इसका इतना प्रभाव था कि अक्सर लोग अपने बेटों का नाम आल्हा ऊदल इन्दल और मल्खानरखते थे।
जब सामन भादो में पानी की झड़ी लगती तो गाव वालो के मनोरंजन का यह मुख्ख साधन था।पर समय के साथ वह भी समाप्त प्रायः है।