जब प्रधानमंत्री नेहरू की कार अर्धरात्रि को तामिया के जंगलों में खराब हुई आत्माराम यादव पीव
जब प्रधानमंत्री नेहरू की कार अर्धरात्रि को तामिया के जंगलों में खराब हुई आत्माराम यादव पीव 
 होशंगाबाद   बात 1952 के दिसम्बर माह की है। पण्डित जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष रहते  दो बार मध्यभारत की यात्रायें कर चुके थे किन्तु प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी यह पहली यात्रा थी जिसमें वे महाकौशल चुनाव के लिये दो दिन रुकने वाले थे। उस समय पण्डित रविशंकर शुक्ल पर कांग्रेस ने ज्यादा जिम्मेदारी दे रखी थी और उन्होने महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल सहित पण्डित जवाहरलाल नेहरू की मध्यभारत की कई यात्रायें सम्पन्न करा चुके थे। नेहरू जी की यह तीसरी यात्रा महाकौशल  चुनाव प्रचार के लिये थी उस समय विन्घ्यप्रदेश  के कप्तान अवधेष प्रतापसिंह महाकौशल प्रान्त के कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद देश में 1952 में संसद एवं विधानमंण्डल कार्यशील हुये तब प्रशासनिक दृष्टि से नये राज्य के रूप में मध्यप्रदेष अस्तित्व में आया और इसके घटक राज्य मध्यप्रदेष मध्यभारत, विन्ध्यप्रदेश एवं भोपाल थे जिनकी अपनी-अपनी विधानसभायें थी। प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू का कार्यक्रम इटारसी, होशगाबाद, पिपरिया, मटकुली, छिन्दवाड़ा सहित अन्य स्थानों पर था और तब चुनाव के लिये प्रधानमंत्री ही नहीं अपितु कोई भी राजनेता या मंत्री सरकारी वाहन का इस्तेमाल नहीं करता था, इसलिये उनके चुनाव प्रचार के लिये वाहन की व्यवस्था का दायित्व जनसेवा से या पार्टी द्वारा किया जाता था जिसका भार  पण्डित रविशंकर शुक्ल पर था,  श्री शुक्ल  ने तब फोन-तार द्वारा दौरे के लिये टेक्सी-कार की व्यवस्थायें करायी थी और नेहरूजी के आयोजन को लेकर वे होशंगाबाद  आये और इस यात्रा की ज़िम्मेदारी शंभूदयाल मिश्रा को सौपी ओर उनके घर ठहरा किया करते थे, उनके तूफानी दौरे से ड्रायवर घबरा गया और उन्होने दूसरे दिन चलने से इंकार कर दिया। अब उनके सामने मोटरकार ओर ड्राइवर की नई समस्या आ गई। 
पण्डित रविशंकर शुक्ल परेशान हो गये, यह बात शंभुदयाल मिश्रा ने भाँप ली ओर उनसे पूछा तब उन्होने बताया कि इस समय होषंगाबाद में मात्र चार लोग है जिनके पास खुद की मोटरकार है जिसमें वकील शालिग्राम  द्विवेदी ऐसे शक्स है, जिनकी कार नयी थी जो कुछ माह पहले ही खरीदी थी। रविशंकर शुक्ल जी शंभूदयाल मिश्रा के साथ वकील शालिग्राम द्विवेदी के घर पहुंचे जहां उनका बेटा एडव्होकेट नवीनचन्द द्विवेदी ने बताया कि वे पूजा कर रहे है, रविशंकर जी ने सोचा पता नहीं पूजा में कितना समय लगेगा, इंतजार किये बिना वे पूजाघर में पहुँच  गये तब शालिग्राम  द्विवेदी ने पूछा कैसे आना हुआ?  तब रविशंकर शुक्ल जी ने कहा एक विशेष काम था,  वायदा करो कि पूरा करोंगे। द्विवेदी जी ने कहा-क्या चाहिये ? पण्डित रविशंकर शुक्ल ने नेहरूजी की यात्रा में मोटर-कार की व्यवस्था न होने की अपनी समस्या रखी और उनसे उनकी नयी मोटरकार मांगी। द्विवेदी जी ने सहर्ष अपनी मोटरकार देने का वचन दिया,  मोटरकार कहीं गयी हुई थी ड्रायवर नहीं होने पर रविशंकर जी अपनी टेक्सी से वापिस शोभापुर पहुंचे जहां नेहरू जी की चुनावी सभा होनी थी। कुछ समय बाद नेहरू जी आ गए ओर उनकी सभा शोभापुर में तीन घन्टे चली जिसे सभी ने ध्यानपूर्वक सुना, उसी समय पता चला कि जिस कार से नेहरू जी आये थे उसके ड्रायवर ने चलने से इंकार कर दिया तब पूरी जिम्मेदारी द्विवेदी जी की कार पर थी जो अब तक होशंगाबाद से आयी नहीं थी, जिसे लेकर शुक्लजी चिंता में डूबे हुये थे और नेहरूजी की मोटरकार के ड्राइवर द्वारा  आगे चलने से इंकार पर वे उसकी खूब खुशामद कर चुके थे जो काम नही आयी। श्रीशुक्ल जी जी के लिये एक-एक मिनिट भारी पड़ रहा था उधर सभा समाप्ति से पूर्व आभार व्यक्त किया जा चुका था और नेहरू जी जनता का अभिवादन करने में लगे थे जिससे श्रीशुक्ल की परेशानी कोई समझ न पाये इसका धैर्य धारण कर वे चेहरे पर शिकन नही पड़ने दे रहे थे कि उनके भाग्य ने साथ दिया और उन्होंने देखा कि उनकी परेशानी पलक झपकते ही दूर हो गयी। अचानक मंच के पास उन्हें शंभूदयाल मिश्रा द्विवेदीजी की मोटरकार से उतरते आते दिखे जिसे देखते ही उनके मन को सकून पहुंचा और उन्होंने शंभूदयाल मिश्रा को आवाज लगायी और वे मिश्र जी के सामने हाजिर हो गये। 
प्रधानमंत्री नेहरूजी जी का अगला पड़ाव पिपरिया में था जहा से वे मटकुली पहुचे सभा हुई ओर सभा समाप्त करते ही रात के 9 बज चुके थे जबकि रात 9 बजे उन्हें  छिन्दवाड़ा पहुँचना था। ड्रायवर ने मटकुली से तामिया होते छिन्दवाडा का रूख किया। सर्दी तेज पड़ने लगी थी, जंगलों की खामोशी  को चीरते हुये मोटरकार आगे बढ़ रही थी कि अचानक एक स्थान पर घने जंगलो ओर पहाड़ों के बीच वह रूक गयी, ड्रायवर ने बताया कि मोटरकार की लाईट खराब हो गयी है । सभी के दिल बैठे जा रहे थे और जंगली जानवरों का शोर किसी भी कमजोर दिल को कॅपा दे रहा था ओर गाड़ी के आसपास शेर कि दहाड़ भी सुनाई दे रही थी। गाड़ी खड़ी हुई वह तामिया का जंगली बियावान रास्ता, ठण्ड से सभी का बुरा हाल हो रहा था और किसी अनहोनी से सभी का दिल बैठा जा रहा था, शुक्ल जी ओर मिश्र जी ड्राइवर से चर्चा कर भाँप गए थे कि आमों कि झुरमुट के पास जंगल का राजा शेर मौजूद है जबकि पण्डित नेहरू दिनभर की थकान के कारण मोटरकार में उनींदे थे वे गाड़ी के रूकने का कारण पूछ ही रहे थे कि ड्रायवर ने बताया कि लाईट ठीक हो गयी,  ड्रायवर की इस खबर से सभी के चेहरे दमक उठे, ओर सुख रहा हलक भी भरा हो गया, शांति तो तब मिली जब ड्राइवर कि समझदारी से पहाड़ों ओर आमों कि झुरमुट पर लाइट करके सावधानी से शेर के भय से मुक्त किया। रात 12 बजे नेहरू जी छिन्दवाड़ा पहुचे,  उन्हें देखने और सुनने के लिये हजारों की सॅख्या में भीड़ कड़ाके के जाड़े में इंतजार कर रही थी। रात्रि के साढ़े बारह बजे नेहरू जी ने बोलना शुरू किया ओर डेढ़ घन्टे तक बोलते रहे, कार्यक्रम समाप्ति के बाद सभी ने भोजन किया और रात्रि विश्राम करने लगे।  दो-ढाई घन्टे की नींद के बाद सुबह 5 बजे सभी उठ गये और ड्रायवर को बुलाया वह भी पण्डित नेहरू और रविशंकर शुक्ल जैसे नेताओं के बीच अपने को धन्य समझते उनकी सेवा में लग गया। आगे की यात्रा में मुंगेली गये जहां कांग्रेसी उम्मीदवार कुंजबिहारी अग्निहोत्री अपनी जीत को लेकर निराशाजनक बातें करने लगे जिसे सुनकर पण्डित नेहरू ने तपाक से डपटते हुये कहा कि यहा यह कैसा उम्मीदवार खड़ा किया है, कांग्रेस  की ओर से एक कार्यकर्ता भी खड़ा हो जाये तो वह चुनाव जीत जायेगा।
मुंगेली के रास्ते में एक पुल पड़ता है जहा सड़क पर एक व्यक्ति जिसका नाम गजाधर था वह मोटर के आगे सड़़क पर लेट गया, ड्रायवर ने उसे लेटा देख ब्रेक मार दिये, नेहरूजी तुरन्त उसे देख कार से कूद पड़े, सभी आष्चर्य में थे कि आखिर क्या हुआ जो नेहरू जी कूदे, उनके साथ पीछे कुछ कार्यकर्ता भी टॅक्सी में थे वे आकार खड़े हो गए। नेहरूजी ने उस व्यक्ति गजाधर को पकड़कर डपटा और बोले तू चाहता क्या है ? बड़ा बदतमीज है, तू कराची में भी आया था, वहा गड़बड़ किया, फिर इलाहाबाद में भी आया और वहॅा से दो-तीन दिन में भगा दिया, अब क्यों आया है, कांग्रेसी स्वयंसेवकों ने तत्काल उसे रास्ते से हटाया और गाड़ी आगे बढ़ गयी। सोहागपुर में नेहरूजी की सभा का आयोजन था जहा भीड़ बेकाबू हो रही थी लेकिन आयोजकों ने सभास्थल से हटकर सड़क पर उनके स्वागत की तैयारी की थी जहा उतावलेपन में जनता मंच छोड़कर सड़क के आसपास पहुँच  गयी जिसे देख नेहरूजी ने अनुशासनहीनता बता नाराज हो गये और मंच पर पहुचे, पीछे-पीछे आयोजक एवं जनता आ गयी। नेरूजी ने वहा सम्बोधन करने से इंकार कर दिया जिससे काग्रेस के नेताओं को सबक मिल गया कि इस प्रकार की पुर्नरावृत्ति नहीं होने देगे। आगे जो भी सभायें हुई , उसमें कांग्रेस अध्यक्ष अवधेष प्रतापसिंह जी उनके आने से पूर्व सभाओं को सम्बोधित कर तब तक व्यवस्था जमाये रखते जब तक कि नेहरूजी न आ जाये। होशंगाबाद में पण्डित जवाहरलाल नेहरू 3 बार आये ओर शंभूदयाल मिश्रा ओर उनके बेटे अश्विनीकुमार मिश्रा के घर  रूककर अपनी आगामी राजनैतिक यात्राओं को अंजाम दिया करते थे। शंभूदयाल मिश्रा का रविशंकर शुक्ल से पारिवारिक संबंध रहे है ओर रविशंकर शुक्ल जी मध्यप्रदेश के पहली विधानसभा के 1 नवंबर 1956 को पहले मुख्यमंत्री के रूप मे शपथ लेकर दूसरी विधानसभा के भी मुख्यमंत्री के रूप में 7 मार्च 1962 तक पदस्थ रहे। जबकि शंभू दयाल जी मिश्रा का आजादी की लड़ाई में बड़ा योगदान रहा तथा वे जज की नौकरी छोड़कर देशसेवा में जुट गए तथा  (1920-1938) के 18 सालों तक केंद्रीय विधानसभा के सदस्य के रूप में कार्य किया और एक राजनीतिक नेता के रूप में उन्होंने डॉ हरिसिंह गौर सच महाकौशल क्षेत्र को हराया तथा 1930 में अवज्ञा आंदोलन को बचाने के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया और कई वर्षों तक सभी समाज के सदस्य के रूप में स्वयं मार्च नमक सत्याग्रह किया एवं 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरा राष्ट्रीय सम्मेलन में पंडित मिश्रा को स्वागत समिति के वें सचिव भी रहे, उनकी इसी सेवाभावना को देखकर पण्डित नेहरू उनके निवास पर रूके, जो इस चुनाव में पण्डित नेहरू के लिये वकील शालिग्राम द्विवेदी के वाहन की सेवा लेकर पहुचे थे उक्त सभी घटनाओ का जिक्र रविशंकर शुक्ल द्वारा शुक्लग्रंथावली में किया है जो एक आईने की तरह इतिहास के पृष्ठों पर भविष्य कि धरोहर का साक्षी प्रमाण है।