सिलेंडर के दाम बढ़े तो फिर जलने लगे चूल्हे:लोग बोले- रेट 820 रुपए का हो गया, सब्सिडी भी नहीं आती, खर्चा कम करने के लिए खाना गैस पर बनाना छोड़ा
*सिलेंडर के दाम बढ़े तो फिर जलने लगे चूल्हे:लोग बोले- रेट 820 रुपए का हो गया, सब्सिडी भी नहीं आती, खर्चा कम करने के लिए खाना गैस पर बनाना छोड़ा*

बाड़मेर से वागाराम बोस की रिपोर्ट 

पाली/ बाड़मेर 
इन्द्रा कॉलोनी निवासी जमनादेवी चौधरी ने कहा महंगाई ज्यादा हैं मजदूरी कर घर चलाती हैं इसलिए खर्च कम करने के लिए चूल्हे पर खाना व गैस पर दूध गर्म करने व चाय बनाती हैं।
गैस के दाम आसमान छू रहे हैं। जिले में 820 रुपए में सिलेंडर आ रहा हैं। कोरोना के चलते पिछले करीब एक साल से लोगों का काम धंधा मंदा पड़ा हैं। जिसके कारण लोग खर्चा कम करने के लिए सिर्फ चाय और दूध गर्म करने के लिए गैस का उपयोग कर रहे हैं। सुबह-शाम का खाना चूल्हें पर ही बन रहा है। जिससे की सिलेंडर ज्यादा चलते। यह कहानी एक या दो घर की नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र में ऐसी सैकड़ों महिलाएं मिल जाएगी जो महंगाई के इस दौर में अपनी गृहस्थी की गाड़ी ढग से चलाने के लिए गैस का उपयोग कम कर दिया हैं। नतीजन ग्रामीण क्षेत्रों में सिलेंडरों की खपत में भी 25 -30 प्रतिशत से अधिक की कमी आई हैं।

सुंंदर नगर निवासी तारादेवी ने कहा बार-बार सिलेंडर के दाम क्यों बढ़ाए जा रहे हैं, सरकार को आमजन का सोचना चाहिए।
सुंंदर नगर निवासी तारादेवी ने कहा बार-बार सिलेंडर के दाम क्यों बढ़ाए जा रहे हैं, सरकार को आमजन का सोचना चाहिए।
गैस हैं सा लेकिन सिलेंडर का रुपया घणा लगा, कठू लावा

खारड़ा गांव की कुछ महिलाएं सिर पर सूखी लकड़ियों लेकर जंगल से गांव की तरफ जाती नजर आई। पूछने पर गांव की फूलीदेवी ने बताया कि घर में गैस हैं लेकिन सिलेंडर के रुपए ज्यादा लगते हैं। इसलिए गैस का उपयोग कम कर दिया हैं। चूल्हे पर खाना बनाते हैं। गांव की ही विमला देवी ने बताया कि सुबह साढ़े नौ बजे घर से निकले थे। खारड़ा बांध की पाल के निकट से सूखी लड़कियां एकत्रित कर के लेकर आए हैं। उन्होंने भी कुछ यही कहानी बताई कि महंगाई ज्यादा हैं। लॉकडाउन में कमाई न के बराबर हैं। इसलिए गैस का उपयोग कम ही करते हैं। लकड़ियों का उपयोग खाना बनाने में करते हैं। जिससे की घर खर्च कुछ कम हो।

जंगल से लकड़िया एकित्रत कर खारड़ा गांव की तरफ जाती महिलाएं।
जंगल से लकड़िया एकित्रत कर खारड़ा गांव की तरफ जाती महिलाएं।
पति वृद्ध हैं, कमाई कम हैं इसलिए खाना चूल्हें पर ही बनाती हूं

इन्द्रा कॉलोनी विस्तार में रहने वाली वृद्धा जमनादेवी ने बताया कि गैस सिलेंडर के 830 रुपए लगते हैं। पति वृद्ध हैं। कमाई कम हैं वे मजदूरी करके घर खर्च चलाती हैं। खर्च कम करने के लिए सुबह-शाम का खाना चूल्हे पर बनाती हैं। गैस का उपयोग चाय आदि बनाने के लिए ही करती हैं।

जंगल से लकड़ियां एकत्रित कर खारड़ा गांव की तरफ जाती महिलाएं।
जंगल से लकड़ियां एकत्रित कर खारड़ा गांव की तरफ जाती महिलाएं।
सिलेंडर महंगा कर दिया, सब्सिडी भी बंद कर दी

सुंदर नगर में रहने वाली तारादेवी ने बताया कि गैस सिलेंडर के दाम बढ़ते जा रहे हैं। 450 रुपए में आने वाला सिलेंडर अब 820 में आ रहा। सब्सिडी भी बंद करदी। ऐसे में हम किया करें। रसोई का बजट बढ़ता जा रहा हैं। सरकार को आम लोगों के बारे में सोचना चाहिए। सिलेंडर हर आम व खास के घर में काम आता हैं। कम से कम उसके दाम न बढ़ाए।

वितरकाें ने कहा - ग्रामीण क्षेत्र में कम हुई खपत

गैस एजेंसी संचालक ताराचंद मीणा बताते हैं कि प्रथम लॉकडाउन से पहले उनकी एजेंसी की गाड़ी, जवाली, बूसी, सोमेसर, खैरवा आदि गांवों में रोजाना के 100 सिलेंडर वितरित कर आती थी। वर्तमान में 65- 70 सिलेंडर ही वितरित हो रहे हैं। ग्रामीणों ने सिलेंडर लेना कम कर दिया बोलते हैं कि लॉकडाउन में आमदानी कम हो गई, रुपए नहीं हैं। एक दूसरी गैस एजेंसी संचालक रवि मीणा ने बताया कि पहले लॉकडाउन से पहले ग्रामीण क्षेत्र में रोजाना 150 के करीब सिलेंडरों की सप्लाई होती थी जो अब घटकर 70-75 पर आ गई हैं।