आत्मनिर्भर भारत" के नाम पर सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर रही केन्द्र सरकार - डॉ. कृष्णा मोदी
आत्मनिर्भर भारत" के नाम पर सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर रही केन्द्र सरकार - डॉ. कृष्णा मोदी


बैतूल/सारनी। कैलाश पाटिल

आज जहां आर्थिक सुस्‍ती को लेकर पहले से ही जूझ रही भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था कोरोना संकट के बीच बुरी तरह हिल चुकी है। हालात ऐसे हैं कि भारत सरकार लगातार सरकारी उपक्रमों में अपनी हिस्‍सेदारी बेचने की योजना पर काम कर रही है। राष्ट्रीय कार्यकरी अध्यक्ष एटक एवं सह पूर्व जेबीसीसीआई सदस्य डॉ. कृष्णा मोदी ने प्रेस नोट जारी करते हुए बताया कि केंद्र सरकार ने संपूर्ण निजीकरण के लिए बहुत बड़ा विनिवेश लक्ष्य रखा है। भारत में लगभग 348 कंपनियां, पीएसयू और सरकारी उपक्रम है जिसे लेकर सरकार ने अब घोषणा की है कि रणनीतिक क्षेत्रों में 4 को छोड़कर सभी सार्वजनिक उद्योगों का अब निजीकरण किया जाएगा। वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए सरकार ने 1.75 लाख रुपए विनिवेश से जुटाने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए सरकार, सरकारी कंपनियों और बैंकों को बेचने और साथ ही सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाने की योजना बना चुकी है। वही सरकार 1 लाख करोड़ सरकारी कंपनियों को बेचकर जुटाएगी, जैसे बैंक और इंश्योरेंस कंपनी आदि। वहीं 75 हजार करोड़ रुपए सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर जुटाए जाएंगए। डॉ मोदी ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बेहतर वित्तीय प्रदर्शन के बावजूद, वर्तमान केंद्र सरकार सक्रिय रूप से लाभकारी सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करके अपने नव उदारवादी सुधारों को आगे बढ़ा रही है, जैसा कि उपरोक्त आंकड़ों अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार सभी सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण और उन्हें निजी कॉर्पोरेट घरानों को सौंपने पर आमादा है। अत्यधिक निजीकरण भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित शब्द समाजवाद तथा लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना में बाधक है। जहां निजीकरण होगा, वहां सामाजिक मूल्यों को हाशिए पर छोड़ दिया जाएगा। कुछ निजी कंपनियों का वित्तीय साम्राज्यवाद बढ़ जाएगा, यही आगे चलकर एकाधिकार में वृद्धि करेगा और समाज में असमानता की खाई को बढ़ाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आत्मानिर्भरता का जाप करते हुए आत्मनिर्भरता की स्वदेशी नीति की ही कमर तोड़ रहे हैं और सक्रिय रूप से भारतीय पूंजीपतियों और वैश्विक साम्राज्यवाद के हितों की सेवा कर रहे हैं। वर्तमान नवउदारवादी सुधार एजेंडा रेलवे, कोयला और तेल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में विनिवेश से नहीं रुका है, बल्कि यह रेलवे, स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों तक फैल चुका है। आज का भारत आत्मनिर्भरता की ओर बड़ते हुए स्वयं ही अपने महत्व आकांक्षी लक्ष्य 2024-25 तक 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था प्राप्त करने चल पड़ा है  जिसमें सभी सार्वजनिक उद्योग अपनी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। 2016 से भारत सरकार की विशेषज्ञ समूह नीति आयोग द्वारा 40 सार्वजनिक उद्योगों में विनिवेश की सूची तैयार की गई थी। कॉविड-19 महामारी की आड़ में अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बहाने सार्वजनिक उद्योगों जैसे बैंक, बीमा, कोयला, बिजली,रेलवे, एयरपोर्ट, बंदरगाह आदि उद्योगों में  विनिवेश किया जा रहा है। साथ ही साथ 44 श्रम कानून के 4 कोड में संहिताकरण कर मजदूरों के मौलिक आधिकरो से खिलवाड़ कर पूंजीपतियों के हक में श्रम कानून बना चुकी है जो 1 अप्रैल 2021 से लागू होने जा रहे है अगर हम सभी लोगो ने एकता बनाकर लड़ाई नही लड़ी तो आने वाली पीढ़ी से गुलामों की तरह मरते हुए कार्य कराएगी।